ग़रीबों पर ज्यादा ज़ोर नहीं चला कोरोना का -दिनेश मालवीय गरीब के पास मुसीबतों और बीमारियों से लड़ने की ताक़त पैसे वालों से ज़्यादा होती है.आपने देखा होगा कि मजदूर को काम करते हुए जब कोई चोट लग जाती है तो वह पानी की पट्टी बांधकर तत्काल फिर काम में लग जाता है. जबकि पैसे वाले को ज़रा-सी चोट लग जाए तो वह फ़ौरन मरहम-पट्टी करवाने दौड़ता है. गरीब मजदूरनी प्रसव के बाद बहुत कम आराम करती है. गरीब को बुखार आने पर, वह या तो घरेलू नुस्खों से ही ठीक हो जाता है, या कोई गोली मेडिकल स्टोर से लाकर खा लेता है. बुखार बहुत बेकाबू होने पर ही वह बमुश्किल डॉक्टर के पास जाता है. वह इतनी ज़्यादा तकलीफों में ज़िन्दगी बसर करता है कि उसकी auto immunity अपने आप बहुत बढ़ जाती है. दुनिया भर को हलकान करने वाली कोरोना महामारी की एक study में यह बात साबित हुयी है कि जो देश गरीब हैं, जहाँ इलाज की सुविधाएँ बहुत कमज़ोर हैं और जिनका जीडीपी बहुत कम है, वहाँ कोरोना का बहुत ज़ोर नहीं चला. वहाँ इस महामारी के कारण कम मौतें हुयीं. इसका जोर उन देशों और लोगों पर बहुत चला जो बहुत अमीर हैं, जहाँ इलाज की बेहतरीन सुविधाएँ हैं और जहाँ लोग air-conditiner में ही सोते-जागते हैं. हमारे देश में ही यह साबित हो गया है कि कोरोना संकट के समय लाखों मजदूर आग बरसाते सूरज की गरमी में पैदल और बहुत सीमित आवागमन के साधनों के साथ झुण्ड के झुण्ड बनाकर अपने घरों को लौटे, लेकिन उनके बीच कोरोना अपना असर नहीं दिखा पाया. सीएसआईआर, भारत के विशेषज्ञों ने विभिन्न देशों में कोरोना से होने वाली मौतों पर किये गये अपने अध्ययन में पाया कि देशों में कोरोना से होने वाली मौतों का सम्बन्ध वहाँ की आबादी में मौजूद ऑटो इम्युनिटी से है. इस शोध का प्रकाशन medRxiv में किया गया है. इन विशेषज्ञों ने 106 देशों में 25 से 30 पेरामीटर्स के आधार पर यह अध्ययन किया, जिसमें आबादी, संचारी और गैर-संचारी रोगों का फैलाव, बीसीजी टीकाकरण, स्वच्छता और प्रति दस लाख लोगों में कोरोना से होने वाली मौतें शामिल थीं. विशेषज्ञों ने पाया कि कोरोना के कारण प्रति दस लाख आबादी पर मरने वालों की संख्या उन देशों में बहुत ज़्यादा है जो समृद्ध हैं और जहाँ की जीडीपी बहुत ऊँची है. यह बात बहुत विरोधाभासी, लेकिन सही है. इस महामारी के कारण अधिक जोखिम 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को है. इस श्रेणी के लोगों की मौत की संख्या भी अमीर देशों में ही ज्यादा रही. यह भी पाया गया कि ऑटो इम्यून से जुड़ी बीमारियों भी अमीर देशों में ही अधिक फैलीं. इनमें टाइप 1 डायबिटीज, अस्थमा, गठिया आदि शामिल हैं, क्योंकि. लेकिन विशेषज्ञों ने यह भी सचेत किया कि इसका मतलब यह भी नहीं है कि स्वच्छता, इलाज की बेहतर सुविधाओं और सेहत से जुडी अन्य बातों पर ध्यान न दिया जाए.